Wednesday, September 16, 2015

युही निकल पड़ता हूँ आजकल
एक बैचेनी, एक खलिश
वजूद पर लिए
निकलते वक्त सोचता नहीं, जाना कहाँ है
मंजिल की फ़िक्र दफ़्न है चाक सीने में कहीं

युही निकल पड़ता हूँ आजकल
जो पाया उससे मुतमईन हूँ
जो न पा सका उसका मलाल नहीं
हसरत फ़क़त इतनी सी
कूचा-ए-यार में बारिश हो जब
उनको याद आये मेरी

युही निकल पड़ता हूँ आजकल
जहाँ राह ले चले
अपने शहर , अपने घर से दूर
और थम जाता हूँ किसी नुक्कड़ पे
न जाने क्या तलाशता हूँ
पर रुकता यहीं हूँ
नए चेहरे हर बार देखता हूँ
नए किस्से सुनता हूँ
ढूंढता हूँ खुद को चाय की चुस्कीयो में

युही निकल पड़ता हूँ आजकल
ये सफ़र अब उम्र भर का है
मुश्किल या आसान ख़बर नहीं
पर चलता चले जाता हूँ
अब इन रास्तो को
मंजिल बना लिया मैंने

शुक्र है मिल जाती गर्म चाय
इन रास्तो पर
मुश्किलो को आसान करने