रपट - 5
शानदार, जबर्जस्त, जिंदाबाद. मांझी दा माउंटन मेन. एक शानदार फिल्म, जबर्जस्त विषय और जिंदाबाद किरदार लिए हुए हमारे पास है, यह मात्र एक फिल्म नही है, नाही यह सिर्फ़ एक बायोपिक है. अगर आप फ़िल्मे सिर्फ़ मनोरंजन के लिए देखते है, तो यह फिल्म देखना ना देखना आपका निर्णय है, वैसे मांझी मे मनोरंजन के सभी तत्व विधमान है. किंतु यदि आप की नज़र सिनेमा मे मनोरंजन से इतर कुछ ढूँढती है तो आपको यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए. इस फिल्म मे आपको एक अनमोल चीज़ मिलती है और उस नायाब शह की आज की दुनिया मे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है और वो है प्रेरणा. दुनिया मे जो कुछ भी उत्साहजनक घटित हुआ है और घटित हो रहा है उसके पीछे किसी की प्रेरणा ही रही है, प्रेरणा प्रेम का ही दूसरा नाम है. यह प्रेम किसी व्यक्ति से, राष्ट्रा से, आपके स्वप्ना से किसी से भी हो सकता है. इस सन्दर्भ मे यह फिल्म एक क्लासिक बन जाती है.' दशरथ मांझी' की कहानी फिल्म मे कही गयी है, किंतु यह सिर्फ़ कहानी नही है अपितु इंसान के बुलंद इरादो की जीत की कहानी है, उसके पहाड़ से भी मजबूत होसले की कथा है. नवाजुद्दीन की अब तक की बेहतरीन फिल्म. निश्चित ही यह फिल्म राष्टिया पुरस्कार एवं ऑस्कर के लिए चयनित होगी. 'मांझी' मे सब कुछ है प्रेम, बदला, यारी, फिर भी ये एक आम मसाला फिल्म कतई नही है. फिल्म की बुनावट, किरदारो का चुनाव, भाषा मे शब्द-चयन सब कुछ अतुलनीय है. आप फिल्म देखते समय यक़ीनन मांझी के साथ खड़े होते है. मांझी के प्रारंभिक द्रिश्य मे खून से लथपथ नवाज जब पहाड़ को चुनोती देता है, वही से पता चल जाता है की मांझी एक क्लासिक है, यह सीन फिल्म मे दुबारा आता है. और ऐसे कई सीन फिल्म मे भरे पड़े है. मसलन नवाज की गाँव मे वापसी का दृश्य, उसकी पत्रकार से मित्रता, फ़ागुनिया (राधिका आप्टे) से संवाद. फिल्म मे पहाड़ मांझी का शत्रु भी है और मित्र भी.
मांझी की कहानी एक ऐसे दौर की कहानी है जब भारत स्वतन्त्रता की अलस्भोर मे था. अंग्रेज़ो से तो छुटकारा मिल गया था, लेकिन हम अपनी ही कुरीतीयो से जूझ रहे थे, ग़रीब-गुर्बे का कुछ भला ना हुआ था, छुआछूत जैसी कुरीति अपने चरम पर थी. उस दौर मे एक साधारण आदमी अपनी ज़िद से, अपने हौसले से पहाड़ का सीना चीरकर उसमे से रास्ता बनता है, वो भी सिर्फ़ छैने और हतोड़े से वो भी अकेले अपने दम पे, सभी उससे नाता तोड़ देते है लेकिन वो हार नही मानता और आख़िरकार वो करके रहता है जो उसने सोचा है. फिल्म के हर संवाद के ग़ूढ अर्थ है, बानगी देखिए नवाज कहते है, "अपना रास्ता खुद बनाओ" या फिर "भगवान के भरोसे मत बैठो, क्या पता वो तुम्हारे भरोसे बैठा हो." या फिर जब वो पत्रकार मित्रा से पूछता है कि "अख़बार शुरू करना क्या पहाड़ तोड़ने से भी ज़्यादा मुश्किल है?" कितने हो लोग है इस दुनिया मे जो कंकड़ जितनी मुश्किल आने पर ही पस्त हो जाते है और अपना रास्ता बदल लेते है उनके लिए माझी एक must watch है.
अभिनय की जहाँ तक बात की जाए तो दशरथ मांझी का किरदार इस समय नवाज के अलावा शायद ही कोई निभा पाए, वे एक जीते जागते स्कूल है. मांझी की पत्नी के रोल मे राधिका आप्टे ने कमाल का अभिनय किया है, पंकज दिवेदि हर अच्छी फिल्म से जुड़ रहे है उन्हे बस एक बड़े किरदार की ज़रूरत है, तिग्मन्शु धुलिया असरदार है. केतन मेहता को सलाम जो उन्होने ऐसे विषय पर ना सिर्फ़ फिल्म बनाई बल्कि उसकी आंचलिकता के साथ पूरी तरह न्याय भी किया. अंत मे नवाज तुम बेहतरीन हो एक आम आदमी, एक बेहतरीन अभिनेता और अब एक सुपर स्टार भी.