कल ही तुमसे वादा किया था की आज अपनी कहानी पोस्ट करूँगा, और इसी इरादे के साथ सुबह की चाय के बाद मोबाइल उठाया तो कम्बख़्त हाथ से छूटा और धरती से ऐसे मिला जैसे बरसो बाद बिछड़े प्रेमी मिले हो, सारे अंजर-पिंजर बिखर गये. मुझे लगा ऐसा मेरे साथ ही क्यू होता है, ये फोन मेरे हाथ मे टिकता क्यू नही. उपर से मैं मोबाइल पर ही क्यू लिखता हूँ. पहले जो दौर था उसमे मोबाइल ऐसे थे की हथौड़ा भी शर्मा जाए.. एक बार एक दोस्त को मोबाइल फेक के भी मारा था और निशाना चूक गया था, दीवार से टकराया था, लेकिन, मज़ाल है जो रत्ती भर भी फ़र्क पड़ा हो नाशपीटे को. बेहयाई से टू टिंग टॉंग कर रहा था.
जब से स्मार्ट फोन नाम की बला आई है तब से लोगो को इंसान से ज़्यादा फोन से इश्क होने लगा है, इस तरह फोन से चिपके रहते है जैसे फेविकोल का जोड़ हो. खैर हम तो फोन से उसी अंदाज मे पेश आते है, जिस बेअदब और बेशर्मी से 'nokia era' मे आया करते थे. बहरहाल बात कहानी की हो रही थी, उसी पर आते है, फोन पे लिखी सारी कहानियातो नही लेकिन कुछ जेहन मे है उन पर फिर से कम करूँगा और अब सबक़ मिल गया है, हमे वापस लौटना होगा कागज पर, नाज़ुक हरफ़ महसूस करने होंगे उंगलियो के पोरो से ताकि आ सके कहानी मे इंसान, कुदरत और 'कहानी'
जब से स्मार्ट फोन नाम की बला आई है तब से लोगो को इंसान से ज़्यादा फोन से इश्क होने लगा है, इस तरह फोन से चिपके रहते है जैसे फेविकोल का जोड़ हो. खैर हम तो फोन से उसी अंदाज मे पेश आते है, जिस बेअदब और बेशर्मी से 'nokia era' मे आया करते थे. बहरहाल बात कहानी की हो रही थी, उसी पर आते है, फोन पे लिखी सारी कहानियातो नही लेकिन कुछ जेहन मे है उन पर फिर से कम करूँगा और अब सबक़ मिल गया है, हमे वापस लौटना होगा कागज पर, नाज़ुक हरफ़ महसूस करने होंगे उंगलियो के पोरो से ताकि आ सके कहानी मे इंसान, कुदरत और 'कहानी'
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