Sunday, August 2, 2015

रपट - ३

नीरज घेवान द्वारा निर्देशित 'मसान' को मिल रही तारीफो ने इसे देखने पर मजबूर किया, अपने इस निर्णय पर मुझे तब गर्व हुआ जब मैने जाना की 'मसान' को मिल रही तारीफ, सराहना की ये वाकई हक़दार है. फिल्म मे सभी कलाकार मँझे हुए है जैंसे संजय मिश्रा, रिचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी आदि, किंतु इन सब के अलावा एक और किरदार है, और वो है शहर बनारस. भारत के पौराणिक महत्व के इस शहर को हम इससे पहले 'बनारस' और 'रांझणा' मे देख चुके है,  लेकिन 'मसान'  मे यह रहस्यमयी शहर अपने रह्स्य खुद खोलता नज़र आता है. फिल्म का टाइटल मसान एक देशज शब्द है है जिसका अर्थ शमशान होता है, एक प्रचलित मान्यता के अनुसार बनारस मे अंतिम संस्कार होने से प्राणी को स्वर्ग  स्थान प्राप्त होता है, आश्चर्य की बात है कि किसी मान्यता ने बानरस के बशिन्दो की बात नही की, जो यहीं जन्मे है यही मरते है, इसकी हवा मे सास लेते है, उनका क्या होता है , क्या वे लोग सुख-दुख से परे है ? या यही उनको जीतेज़ी स्वर्ग मिल जाता है ? बहरहाल फिल्म मे नये- पुराने कलाकारो ने बेहतरीन अभिनय किया है, रिचा चड्ढा लाजवाब है, किंतु सबसे बेहतरीन काम किया है संजय मिश्रा ने, वे वास्तव मे बनारस के किसी घाट पे बैठे महाराज लगते है. हमने उन्हे ज़्यादातर हँसने-हँसाने वाले किरदार निभाते देखा है, किंतु पिछले कुछ समय से उन्हे गंभीर भूमिकाओ मे देख रहे है और ये भूमिकाए इतनी सशक्त होती है कि इनके बिना फिल्म की कल्पना भी मुमकिन नही. 'मसान' मे उन्होने एक ऐसे मजबूर पिता का पात्र अभिनीत किया है जो एक ओर लोभी पुलिस वाले के द्वारा लूटा जा रहा है वही दूसरी ओर अपनी  ही बेटी से उसका द्वंद चल रहा है. फिल्म मे दो कहानिया समानांतर चलती रहती है और अंत मे घाट पे दोनो कहानियो के पात्र मिलते है. वैसे फिल्म देखने की एक और वजह ये भी हो सकती है की इसमे दुष्यंत कुमार के शेर को गीत रूप मे लिया है, दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संग्रह 'साए मे धूप' हिन्दी का वो बेहतरीन सरमाया है जिसने ग़ज़ल को अरबी-फ़ारसी के भारी भरकम शब्दो से निजात दिलाई और आमजन मे ग़ज़ल को  लोकप्रिय किया. निर्देशक के ये पहली फिल्म है लेकिंग उनका काम
देख कर लगता है वे सिनेमा विधा के पुराने जानकार है.  अगर बेहतरीन सिनिमा देखने के शौक़ीन है, तो ये फिल्म आपके लिए है.








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