रपट - २
प्रदीप सरकार निर्देशित एवं रानी मुखेर्जी अभिनीत 'मर्दानी' बहुत समय बाद आई एक ऐसी फिल्म जान पड़ती है जो मुख्यधारा की तो है लेकिन इसका उदेश्य केवल मनोरंजन करना नही है. फिल्म मानव तस्करी पर आधारित है. आज भारत मे मानव 'Child Traficking' एक बहुत बड़ा मुद्दा बनता जा रा है. ये सामाजिक सोद्धेश्यता के साथ बनाई गयी एक बेहतरीन फिल्म है. निर्देशन बेहद चुस्त है जो फिल्म को एक गति प्रदान करता है और दर्शक प्रारम्भ से अंत तक सीट से चिपके रहते है. अमूमन किसी bollywood फिल्म से हम ये अपेक्षा नही रखते कि उसमे गीत ना हो, हेरोइन के लटके-झटके ना हो और तो और फिल्म मे हीरो ही ना हो. बावजूद, इन सबके यह एक विशुध भारतिया फिल्म है और फिल्म का हीरो है 'रानी मुखेर्जी'., जिन्होने अपने दमदार अभिनय से साबित कर दिया की वो वास्तव मे रानी है. action हो या emotion रानी हर सीन मे फिट बैठती है. अब हीरो (रानी) दमदार हो तो उसे टक्कर देने के लिए विलेन भी शातिर चाहिए. महज एक फिल्म पुराने 'ताहिर राज भसीन' विलेन है और उन्होने शानदार acting की है. इस साल आई कुछ बेहतरीन फ़िल्मो मे मर्दानी को शुमार किया जा सकता है. यह एक महिलाप्रधान फिल्म ज़रुरू है लेकिन इसमे 'हेरोइस्म' की कमी कतई नही है.
मर्दानी टाइटल कहाँ से आया होगा जब ये ख़याल मन मे आता है तो याद आता है रानी मुखेर्जी ने बचपन का कुछ समय झाँसी मे बिताया है, हो सकता है वे झाँसी के किले मे गयी हो जहाँ मुख्य फाटक से भीतर प्रवेश करते हुए बाए हाथ पे एक संगमरमर की शिला पर प्रसिद्द कवियित्रि 'सुभद्रा कुमारी चौहान' की पंक्तिया उकेरी हुई है.
"चमक उठी सन सत्तावन मे, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लदी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी."
शायद यही से 'मर्दानी' शब्द रानी के अवचेतन मे रह गया हो. रानी तो वे है ही और अब 'मर्दानी' भी बन गयी है.
बहरहाल हर 'मर्दानी' को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए.
प्रदीप सरकार निर्देशित एवं रानी मुखेर्जी अभिनीत 'मर्दानी' बहुत समय बाद आई एक ऐसी फिल्म जान पड़ती है जो मुख्यधारा की तो है लेकिन इसका उदेश्य केवल मनोरंजन करना नही है. फिल्म मानव तस्करी पर आधारित है. आज भारत मे मानव 'Child Traficking' एक बहुत बड़ा मुद्दा बनता जा रा है. ये सामाजिक सोद्धेश्यता के साथ बनाई गयी एक बेहतरीन फिल्म है. निर्देशन बेहद चुस्त है जो फिल्म को एक गति प्रदान करता है और दर्शक प्रारम्भ से अंत तक सीट से चिपके रहते है. अमूमन किसी bollywood फिल्म से हम ये अपेक्षा नही रखते कि उसमे गीत ना हो, हेरोइन के लटके-झटके ना हो और तो और फिल्म मे हीरो ही ना हो. बावजूद, इन सबके यह एक विशुध भारतिया फिल्म है और फिल्म का हीरो है 'रानी मुखेर्जी'., जिन्होने अपने दमदार अभिनय से साबित कर दिया की वो वास्तव मे रानी है. action हो या emotion रानी हर सीन मे फिट बैठती है. अब हीरो (रानी) दमदार हो तो उसे टक्कर देने के लिए विलेन भी शातिर चाहिए. महज एक फिल्म पुराने 'ताहिर राज भसीन' विलेन है और उन्होने शानदार acting की है. इस साल आई कुछ बेहतरीन फ़िल्मो मे मर्दानी को शुमार किया जा सकता है. यह एक महिलाप्रधान फिल्म ज़रुरू है लेकिन इसमे 'हेरोइस्म' की कमी कतई नही है.
मर्दानी टाइटल कहाँ से आया होगा जब ये ख़याल मन मे आता है तो याद आता है रानी मुखेर्जी ने बचपन का कुछ समय झाँसी मे बिताया है, हो सकता है वे झाँसी के किले मे गयी हो जहाँ मुख्य फाटक से भीतर प्रवेश करते हुए बाए हाथ पे एक संगमरमर की शिला पर प्रसिद्द कवियित्रि 'सुभद्रा कुमारी चौहान' की पंक्तिया उकेरी हुई है.
"चमक उठी सन सत्तावन मे, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लदी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी."
शायद यही से 'मर्दानी' शब्द रानी के अवचेतन मे रह गया हो. रानी तो वे है ही और अब 'मर्दानी' भी बन गयी है.
बहरहाल हर 'मर्दानी' को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए.
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