Sunday, August 30, 2015

कल ही तुमसे  वादा किया था की आज अपनी कहानी पोस्ट करूँगा, और इसी इरादे के साथ सुबह की चाय के बाद मोबाइल उठाया तो कम्बख़्त हाथ से छूटा और धरती से ऐसे मिला जैसे बरसो बाद बिछड़े प्रेमी मिले हो, सारे अंजर-पिंजर बिखर गये. मुझे लगा ऐसा मेरे साथ ही क्यू होता है, ये फोन मेरे हाथ मे टिकता क्यू नही. उपर से मैं मोबाइल पर ही क्यू लिखता हूँ. पहले जो दौर था उसमे मोबाइल ऐसे थे की हथौड़ा भी शर्मा जाए.. एक बार एक दोस्त को मोबाइल फेक के भी मारा था और निशाना चूक गया था, दीवार से टकराया था, लेकिन, मज़ाल है जो रत्ती भर भी फ़र्क पड़ा हो नाशपीटे को. बेहयाई से टू टिंग टॉंग कर रहा था.

जब से स्मार्ट फोन नाम की बला आई है तब से लोगो को इंसान से ज़्यादा फोन से इश्क होने लगा है, इस तरह फोन से चिपके रहते है जैसे फेविकोल का जोड़ हो. खैर हम तो फोन से उसी अंदाज मे पेश आते है, जिस बेअदब और बेशर्मी से 'nokia era' मे आया करते थे. बहरहाल बात कहानी की हो रही थी, उसी पर आते है, फोन पे लिखी सारी कहानियातो नही लेकिन कुछ जेहन मे है उन पर फिर से कम करूँगा और अब सबक़ मिल गया है, हमे वापस लौटना होगा कागज पर, नाज़ुक हरफ़ महसूस करने होंगे उंगलियो के पोरो से ताकि आ सके कहानी मे इंसान, कुदरत और 'कहानी'








रपट - 5

शानदार, जबर्जस्त, जिंदाबाद. मांझी दा माउंटन मेन. एक शानदार फिल्म, जबर्जस्त विषय और जिंदाबाद किरदार लिए हुए हमारे पास है, यह मात्र एक फिल्म नही है,  नाही यह सिर्फ़ एक बायोपिक है. अगर आप फ़िल्मे सिर्फ़ मनोरंजन के लिए  देखते है, तो यह फिल्म देखना ना देखना आपका निर्णय है, वैसे मांझी मे मनोरंजन के सभी तत्व विधमान है. किंतु यदि आप की  नज़र  सिनेमा मे मनोरंजन से इतर कुछ ढूँढती है तो आपको यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए. इस फिल्म मे आपको एक अनमोल चीज़ मिलती है और उस नायाब शह की आज की दुनिया मे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है और वो है प्रेरणा. दुनिया मे जो कुछ भी उत्साहजनक घटित हुआ है और घटित हो रहा है उसके पीछे किसी की प्रेरणा ही रही है, प्रेरणा प्रेम का ही दूसरा नाम है. यह प्रेम किसी व्यक्ति से, राष्ट्रा से, आपके स्वप्ना से किसी से भी हो सकता है. इस सन्दर्भ मे यह फिल्म एक क्लासिक बन जाती है.' दशरथ मांझी'  की कहानी फिल्म मे कही गयी है, किंतु यह सिर्फ़ कहानी नही है अपितु इंसान के बुलंद इरादो की जीत की कहानी है,  उसके पहाड़ से भी मजबूत होसले की कथा है. नवाजुद्दीन की अब तक की बेहतरीन फिल्म. निश्चित ही यह फिल्म राष्टिया पुरस्कार एवं ऑस्कर के लिए चयनित होगी. 'मांझी'  मे सब कुछ है प्रेम, बदला, यारी, फिर भी ये एक आम मसाला फिल्म कतई नही है. फिल्म की बुनावट, किरदारो का चुनाव, भाषा मे शब्द-चयन सब कुछ अतुलनीय है. आप फिल्म देखते समय यक़ीनन मांझी के साथ खड़े होते है. मांझी के प्रारंभिक द्रिश्य मे खून से लथपथ नवाज जब पहाड़ को चुनोती देता है, वही से पता चल जाता है की मांझी एक क्लासिक है, यह सीन फिल्म मे दुबारा आता है. और ऐसे कई सीन फिल्म मे भरे पड़े है. मसलन नवाज की गाँव मे वापसी का दृश्य, उसकी पत्रकार से मित्रता, फ़ागुनिया (राधिका आप्टे) से संवाद. फिल्म मे पहाड़ मांझी का शत्रु भी है और मित्र भी.

मांझी की कहानी एक ऐसे दौर की कहानी है जब भारत स्वतन्त्रता की अलस्भोर मे था. अंग्रेज़ो से तो छुटकारा मिल गया था, लेकिन हम अपनी ही कुरीतीयो से जूझ रहे थे, ग़रीब-गुर्बे का कुछ भला ना हुआ था, छुआछूत जैसी कुरीति अपने चरम पर थी. उस दौर मे एक साधारण आदमी अपनी ज़िद से, अपने हौसले से पहाड़ का सीना चीरकर उसमे से रास्ता बनता है, वो भी सिर्फ़ छैने और हतोड़े से वो भी अकेले अपने दम पे, सभी उससे नाता तोड़ देते है लेकिन वो हार नही मानता और आख़िरकार वो करके रहता है जो उसने सोचा है. फिल्म के हर संवाद के ग़ूढ अर्थ है, बानगी देखिए नवाज कहते है, "अपना रास्ता खुद बनाओ" या फिर "भगवान के भरोसे मत बैठो, क्या पता वो तुम्हारे भरोसे बैठा हो." या फिर जब वो पत्रकार मित्रा से पूछता है कि "अख़बार शुरू करना क्या पहाड़ तोड़ने से भी ज़्यादा मुश्किल है?" कितने हो लोग है इस दुनिया मे जो कंकड़ जितनी मुश्किल आने पर ही पस्त हो जाते है और अपना रास्ता बदल लेते  है उनके लिए माझी एक must watch है.

अभिनय की जहाँ तक बात की जाए तो दशरथ मांझी का किरदार इस समय नवाज के अलावा शायद ही कोई निभा पाए, वे एक जीते जागते स्कूल है. मांझी की पत्नी के रोल मे राधिका आप्टे ने कमाल का अभिनय किया है, पंकज दिवेदि हर अच्छी फिल्म से जुड़ रहे है उन्हे बस एक बड़े किरदार की ज़रूरत है, तिग्मन्शु धुलिया असरदार है. केतन मेहता को सलाम जो उन्होने ऐसे विषय पर ना सिर्फ़ फिल्म बनाई बल्कि उसकी आंचलिकता के साथ पूरी तरह न्याय भी किया. अंत मे नवाज तुम बेहतरीन हो एक आम आदमी, एक बेहतरीन अभिनेता और अब  एक सुपर स्टार भी.





Friday, August 7, 2015

रपट - ४ 

पिछले हफ्ते रिलीस हुई  'द्रिश्यम'  अजय देवगन की बेहतरीन फ़िल्मो मे से एक है, इसमे उन्होने एक आम इंसान का किरदार निभाया है, उनकी पिछली कुछ फ़िल्मो मे वे  'लार्जर दॅन लाइफ'  किरदार निभाते देखे गये है, इसके उलट दृश्याम मे वे एक मध्यमवर्गीय आम आदमी विजय सालगावकर बने है जिसका एक खुशहाल परिवार है और परिवार की खुशियो मे दखल पड़ जाता है जब पोलीस की आला अफ़सर का बेटा अचानक गायब हो जाता है और इस सिलसिले मे पूरा पोलीस महकमा विजय सालगावकर के पीछे पड़ जाता है और अंत मे विजय की जीत होती है. विजय एक कम पढ़ालिखा किंतु मेहनती व्यक्ति है वह अपने परिवार के साथ पेंडुलिंम मे रहता हैं फिल्म मे अजय देवगन, तब्बू, श्रिया सरन प्रमुख भूमिकाओ मे है. तब्बू ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 'विजयपथ' से की थी जिसमे अजय देवगन हीरो थे. विजयपथ तक पहुचते अजय देवगन एक एक्शन हीरो के रूप मे स्थापित हो गये थे, आज 2015 मे वे एक आम आदमी बने है और द्रिश्यम एक थ्रिलर है इसके बावजूद वे ज़रा भी एक्शन करते नज़र नही आए है, वे जो भी करते है दिमाग़ से करते है. इस थ्रिलर मे दर्शक आख़िरी तक सीट से चिपके रहते है जबकि प्रारम्भ से ही पता  होता है कि किसकीे हत्या हुई, किसने की और क्यो की. कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ती है की एक जुर्म हुआ है और विजय उस जुर्म को छुपाना चाहता है ताकि वो अपने परिवार को बचा सके और विजय इसमे कामयाब भी होता है पोलीस चाह कर भी सच सामने नही ला पाती. दर्शक जुर्म को छुपाने वाले विजय के साथ रहते है.  निशिकांत कामत 'द्रिश्यम' के निर्देशक है और वे हिन्दी के अलावा मराठी सिनेमा मे भी सक्रिय है. 'द्रिश्यम' उनकी दूसरी बड़ी कामयाबी है इससे पहले वे 'फोर्स' नामक सफल फिल्म बना चुके है. रीमेक फ़िल्मे हमेशा से बनती रही है और आगे भी बनती रहेगी. किंतु विगत कुछ समय से सभी सुपर सितारे दक्षिण भारतीय भाषाओ मे बनी फ़िल्मो के  रीमेक मे नज़र आ रहे है, 'गजिनी' और 'वांटेड' से शुरू हुआ ये सफ़र काफ़ी रोमांचक हो गया है. इधर बाहुबली ने कमाई के नये कीर्तिमान स्थापित किए है और दक्षिण भारतीय सिनिमा के लिए एक नये युग का प्रारम्भ किया है.फिल्म का संगीत औसत है किंतु इससे का बात का मलाल आपको फिल्म देखते हुए नही होगा, अतः फिल्म नगरी मुंबई को अपने सिनेमा का स्तर ऊँचा करना होगा क्यूंकी दक्षिण भारतिया फ़िल्मे लगातार विकास कर रही है और उनपे पैसा भी जमकर खर्च किया जा रहा है. बहरहाल वापस 'द्रिश्यम' पर आते है, फिल्म का संगीत औसत है किंतु इससे का बात का मलाल आपको फिल्म देखते हुए नही होगा. इस हफ्ते 'द्रिश्यम' के लिए समय ज़रूर निकाले.








Sunday, August 2, 2015

रपट - ३

नीरज घेवान द्वारा निर्देशित 'मसान' को मिल रही तारीफो ने इसे देखने पर मजबूर किया, अपने इस निर्णय पर मुझे तब गर्व हुआ जब मैने जाना की 'मसान' को मिल रही तारीफ, सराहना की ये वाकई हक़दार है. फिल्म मे सभी कलाकार मँझे हुए है जैंसे संजय मिश्रा, रिचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी आदि, किंतु इन सब के अलावा एक और किरदार है, और वो है शहर बनारस. भारत के पौराणिक महत्व के इस शहर को हम इससे पहले 'बनारस' और 'रांझणा' मे देख चुके है,  लेकिन 'मसान'  मे यह रहस्यमयी शहर अपने रह्स्य खुद खोलता नज़र आता है. फिल्म का टाइटल मसान एक देशज शब्द है है जिसका अर्थ शमशान होता है, एक प्रचलित मान्यता के अनुसार बनारस मे अंतिम संस्कार होने से प्राणी को स्वर्ग  स्थान प्राप्त होता है, आश्चर्य की बात है कि किसी मान्यता ने बानरस के बशिन्दो की बात नही की, जो यहीं जन्मे है यही मरते है, इसकी हवा मे सास लेते है, उनका क्या होता है , क्या वे लोग सुख-दुख से परे है ? या यही उनको जीतेज़ी स्वर्ग मिल जाता है ? बहरहाल फिल्म मे नये- पुराने कलाकारो ने बेहतरीन अभिनय किया है, रिचा चड्ढा लाजवाब है, किंतु सबसे बेहतरीन काम किया है संजय मिश्रा ने, वे वास्तव मे बनारस के किसी घाट पे बैठे महाराज लगते है. हमने उन्हे ज़्यादातर हँसने-हँसाने वाले किरदार निभाते देखा है, किंतु पिछले कुछ समय से उन्हे गंभीर भूमिकाओ मे देख रहे है और ये भूमिकाए इतनी सशक्त होती है कि इनके बिना फिल्म की कल्पना भी मुमकिन नही. 'मसान' मे उन्होने एक ऐसे मजबूर पिता का पात्र अभिनीत किया है जो एक ओर लोभी पुलिस वाले के द्वारा लूटा जा रहा है वही दूसरी ओर अपनी  ही बेटी से उसका द्वंद चल रहा है. फिल्म मे दो कहानिया समानांतर चलती रहती है और अंत मे घाट पे दोनो कहानियो के पात्र मिलते है. वैसे फिल्म देखने की एक और वजह ये भी हो सकती है की इसमे दुष्यंत कुमार के शेर को गीत रूप मे लिया है, दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संग्रह 'साए मे धूप' हिन्दी का वो बेहतरीन सरमाया है जिसने ग़ज़ल को अरबी-फ़ारसी के भारी भरकम शब्दो से निजात दिलाई और आमजन मे ग़ज़ल को  लोकप्रिय किया. निर्देशक के ये पहली फिल्म है लेकिंग उनका काम
देख कर लगता है वे सिनेमा विधा के पुराने जानकार है.  अगर बेहतरीन सिनिमा देखने के शौक़ीन है, तो ये फिल्म आपके लिए है.