Sunday, September 7, 2014

रपट - २

प्रदीप सरकार निर्देशित एवं रानी मुखेर्जी अभिनीत 'मर्दानी' बहुत समय बाद आई एक ऐसी फिल्म जान पड़ती है जो मुख्यधारा की तो है लेकिन इसका उदेश्य केवल मनोरंजन करना नही है. फिल्म मानव तस्करी पर आधारित है. आज भारत मे मानव 'Child Traficking'  एक बहुत बड़ा मुद्दा बनता जा रा है. ये सामाजिक सोद्धेश्यता के साथ बनाई गयी एक बेहतरीन फिल्म है. निर्देशन बेहद चुस्त है जो फिल्म को एक गति प्रदान करता है और दर्शक प्रारम्भ से अंत तक सीट से चिपके रहते है. अमूमन किसी bollywood फिल्म से हम ये अपेक्षा नही रखते कि उसमे गीत ना हो, हेरोइन के लटके-झटके ना हो और तो और फिल्म मे हीरो ही ना हो. बावजूद, इन सबके यह एक विशुध भारतिया फिल्म है और फिल्म का हीरो है 'रानी मुखेर्जी'., जिन्होने अपने दमदार अभिनय से साबित कर दिया की वो वास्तव मे रानी है. action हो या emotion  रानी हर सीन मे फिट बैठती है. अब हीरो (रानी) दमदार हो तो उसे टक्कर देने के लिए विलेन भी शातिर चाहिए. महज एक फिल्म पुराने 'ताहिर राज भसीन' विलेन है और उन्होने शानदार acting की है. इस साल आई कुछ बेहतरीन फ़िल्मो मे मर्दानी को शुमार किया जा सकता है. यह एक महिलाप्रधान फिल्म ज़रुरू है लेकिन इसमे 'हेरोइस्म' की कमी कतई नही है.

मर्दानी टाइटल कहाँ से आया होगा जब ये ख़याल मन  मे आता है तो याद आता है रानी मुखेर्जी ने बचपन का कुछ समय झाँसी मे बिताया है, हो सकता है वे झाँसी के किले मे गयी हो जहाँ मुख्‍य फाटक से भीतर प्रवेश करते हुए बाए हाथ पे एक संगमरमर की शिला पर प्रसिद्द कवियित्रि 'सुभद्रा कुमारी चौहान' की पंक्तिया उकेरी हुई है.

"चमक उठी सन सत्तावन मे, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लदी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी."

शायद यही से 'मर्दानी' शब्द रानी के अवचेतन मे रह गया हो. रानी तो वे है ही और अब 'मर्दानी' भी बन गयी है.
बहरहाल हर 'मर्दानी' को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए.





















 

Wednesday, September 3, 2014

शीर्षक गुम - 5

एक गहरी साँस छोड़ी उसने और मेरे बदन से हट गयी, वो आईने के सामने खड़ी होके खुद को समेटने लगी. मैं उसके पीछे गया वो बाल बना रही थी मैं आईने मे उसे देख रहा था और मन ही मन उसकी तारीफ कर रहा था, मैने उसे बाहों मे भर लिया, "I love you"
"ok"
मैने उसे चूमा और दुबारा कहा, "I love u"
उसने कहा, "ok ना बाबा" मैने पूछा कि वो कभी मुझे i love u क्यू नही बोलती, उसने मेरे कंधे पे हाथ रखा और कहा, "जानेमन इस भारी दोपहर मे, wokring hours मे अकेले तुम्हारे फ्लॅट मे, तुम्हारे बेडरूम मे तुम्हारे साथ सोई थी, इतना काफ़ी नही प्यार जताने क लिए "

मैने प्रतिकार किया, "क्या सिर्फ़ सोने से प्यार proove होता है"
"हां"
"पिछले tuesday तुम बॉस के साथ गयी थी, क्या वो भी प्यार था"
वो बिगड़ी,  "क्या बक रहे हो"
"बक नही रहा, पूरा office जनता है, पूरे 3 दिन तुम बॉस के घर गयी और यही नही वहाँ रात भी गुज़ारी" मैं गरजा.
"तो तुम मेरी जासूसी कर रहे हो?"
"नही मैं तुम्हारी care कर रहा हूँ" मेरा जवाब था.
"मत करो इतनी care, अपने काम से काम रखो Mr Rajat"
"Oh now I become Mr Rajat,  कल तुम्हारे मोबाइल मे regional head का sms भी था, ' hi baby how are you'
उसने मुझे धक्का दिया, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा फोन छूने की, तुम होते कौन हो, मत भूलो मैं seniour हूँ तुम्हारी, so please, अपनी हद मे रहो"
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ"
"भाड़ मे गया तू और तेरा प्यार, दफ़ा हो यहाँ से और आइन्दा तमीज़ से पेश आना, तुम जैसे छोटे शहरो से आए लड़को की यही problem होती है ज़रा सा हंस बोल क्या लो प्यार का राग अलापने लगते हैं":
मैं अवाक था, मेरे मुह से निकला , "बस हंसी बोली थी तुम मेरे साथ तो ये सब क्या था जो अभी हमारे बीच हुआ"
शब्दो को चबाते हुए वो बोली "That-was-sex-you-fool"  उसके चेहरे पे व्यंग था, "now don't irritate me go and get a cup of coffee for me"
मेरी आँखों मे ख़ून उतर आया था पर मे कुछ नही कह पाया सिवाय उसे एक तमाचा रसीद करने के. वो पैर पटकती हुई मेरी नज़रो से ओझल हो गयी.

अगले दिन जब मैं office पहुचा तो मेरा termination letterr  मेज़ पर मेरा इन्तिजार कर रहा था. मैने खोल कर देखा आख़िर मे बॉस के signature थे.

















Tuesday, August 26, 2014

रपट - 1

इन दिनो पाकिस्तानी कलाकार हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री मे छाए हुए है, हूमेमा मलिक राजा नटवरलाल मे इमरान हाशमी संग रोमॅन्स करती नज़र आएँगी तो फवाद ख़ान सोनम कपूर के साथ खूबसूरत मे दिखाई देंगे. किसी ने सच कहा है की कला की कोई सरहद नही होती. यूँ सरहद तो गोलियो की भी नही होती इस पार से चले या उस पार से मरता हमेशा बेगुनाह ही है. पड़ोसी देश अब उस शराबी की जैसे हो गया है जो रात मे शराब के नशे मे पडॉसियों  को तंग करता है चौक पर खड़े होकर हर जाने जाने वाले से गाली-गलौज करता है और सुबह उठ सभी से दुआ सलाम करता है, ख़ैरियत पूछता है. खैर सरहद पर जवान तैनात है मुह तोड़ जवाब देने के लिए मगर सवाल ये है की जब दोनो मुल्को की 70% से ज़्यादा आबादी ग़रीबी और भुखमरी मे अपना जीवन गुजर रही है वहाँ इस तरह हथियारो पे पैसा बर्बाद करना कहाँ की अकल्मंदी है. रोज़  सैकड़ो राउंड गोलिया बेवजह दागी जाती है. एक गोली की कीमत पे पचासो रोटिया तवे पे चढ़ जाए और ना जाने कितने बेघरो, बच्चो और और बूढ़ो को दो वक्त की रोटी नसीब हो. दुआ करता हूँ पड़ोसी को उपरवाला अक्ल बक्शे. 





































Monday, August 18, 2014

शीर्षक गुम - 4

हम तेज रफ़्तार से हाइवे पर भागे जा रहे थे, म्यूज़िक लाउड था और हम सब के हाथो मे ड्रिंक्स थे. शायद saturday का होना उतना ही important था जितना की पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना. बस आगे से एक u turn और और उसके बाद जाम ख़त्म कर ढाबे पर लजीज़ खाना. देर रात घर पहुचना, बेसुध हो पलंग पे पसर जाना और ख़ुमारी लाने वाले sunday का इंतजार करना. हर वीकेंड की तरह इस इस वीकेंड का भी काम तमाम.

नया रायपुर के flyover के नीचे से गुजरने के तुरंत बाद एक अंडे वाला सड़क किनारे खड़ा रहता है. शहर से लाए snacks के अलावा boiled eggs की बात ही कुछ और है. मैने हॉर्न दिया, वो दौड़ता हुआ आया और हमारा ऑर्डर ले गया. हम बेसब्री से इंतेज़ार करने लगे इस बार उसे ऑर्डर सर्व करने मे समय ज़्यादा लग रहा था. तभी मेरी नज़र ठेले से फलाँग भर दूर गिट्टी के ढेर पर गयी. उस ढेर पे एक बची गमछा बिछा गहरी नींद मे सोई हुई थी. मुझे अब देरी का कारण समझ आ गया था. वैसे हर बार वो छोटी बच्ची अपने पिता की सहायता करती नज़र आती.. उस बच्ची को देख मुझे खुद पे तरस आया की एक तरफ मैं नर्म बिस्तर पे करवट बदलता रहता हू पर नींद आँखों से कोसो दूर रहती है. दूसरी तरफ मेहनतकश लोग और उनके फूल से बच्चे काँटों के बिस्तर पे भी चैन से सोते है. मैं अपने ख़यालो मे मसरूफ़ था की गाड़ी पे हुए knock  ने मुझे बताया की ऑर्डर आ चुका था हम आरंग की और बढ़ गये. पूरे 15 दिन हो गये लेकिन उस बच्ची की तस्वीर मेरी आँखों से ओझल ना हुई. पता नही बेचारा और ग़रीब अंडे वाला और उसकी बेटी है या हम. हम दूसरो की मेहनत पर अपनी चर्बी बढ़ाने वाले लोग.

उस दिन से मैं सोच रहा हूँ की जीवन क्या है एक पहेली जिसे सुलझा पाना आम इंसान के बूते की बात नही. इसे समझने की लिए महल छोड़ने पड़ते है, सोने के मुकुट का त्याग करना होता है, गौतम से बुद्ध बनना पड़ता है. तब बोध ज्ञान की प्राप्ति होती है. जिंदगी को जीने के लिए क्या चाहिए एक मोह्हबब्त भरा दिल, एक प्यार करने वाला शक्स और फूलो, तितलियो से इश्क करने की सलाहियत. जीना इसी का नाम है. 






Monday, July 28, 2014

शीर्षक गुम - ३

बल्ब की मरियल पीली रोशनी कमरे मे फैली हुई थी, कीड़े इस रोशनी के गिर्द उड़ और रेंग रहे थे इस बात से बेख़बर की मौत भी चुपचाप उनकी तरफ़ बढ़ रही है. दीवार पे चिपकी छिपकली कभी सरपट रेंगती और कभी इंतज़ार कर सही मौका झपट किडो को नीवाला बनाती जा रही थी. मैं कमरे मे लेटा ये सब रोज की तरह देख रा था. कीड़े रोशनी की तरफ जाने की ज़िद किए बैठे थे और मौत वही अपने पंजे फैलाए  जमी थी. मुझे कींडो पे तरस आ रा था और उनकी नादानी पे गुस्सा भी. क्यू नही वे इस रोशनी से दूर चले जाते बाकी तीन दीवारो पे बेशक अंधेरा था पर वहाँ मौत तो ना थी आख़िर क्या ज़रूरत हैं उन्हे इस सिम्त आने की.

जवाब मुझे मेरे अक्स ने दिया, क़ि मैं क्यू आया था शहर, क्या मिला मुझे यहाँ आकर, ये छोटा सा धूल और सीलन भरा कमरा जो कहने को एक अदद घर है लेकिन घर जैसी गर्माहट, हिफ़ाज़त और मिट्टी की खुश्बू यहाँ कभी नसीब नही हुई. मैने भी तो रोशनी की तलाश मे आया था शहर, गाँव के दिए को बुझाकर, बड़े से प्रकाश पुंज को पा लेने की हसरत लिए. क्यू नही रहा गाँव मे अपने लोगो की बीच, घर, खेत-खलिहान, तालाब, मंदिर सब कुछ तो था वहाँ फिर क्यूँ खिच लाई शहर की चाकांचौध मुझे.

मैं पसीने से तरबतर हो गया मेरा अक्स कहीं खो गया था मैने खुद को कीड़ा बन दीवार पे रेंगेते हुए देखा, मुझे एहसास हो चला था की उन किडो की और मेरी जिंदगी मे कोई फ़र्क ना था.

सचाई मुझे बर्दाश्त नही हुई मैं उठा और खटका दबा के कमरे को अंधेरे से भर दिया. 








Friday, July 18, 2014

शीर्षक गुम - २

एक तरफ वो और उसका घर था दूसरी तरफ मेरी मंज़िल का सफ़र, वक़्त ने इस दोराहे पर लाके मुझे खड़ा कर दिया था. उसने मुझसे यही कहा था कि चुन लो मैं या म्यूज़िक. उसे भूल पाना मुमकिन ना था लेकिन म्यूज़िक मेरे लिए सांस लेने की तरह था बिना सांस लिए कैसे रहू और उसके बगैर कैसे जियु. मैने खुद से सवाल किया मैं किसके ज़्यादा करीब हू और किसको मैं नही छोड़ सकता एक ही तरीका था . मैने कंधे से गिटार उतारा उंगलिया कॉर्ड्स पर जमाई औरे एक धुन बजाई . ट्ननननन.

मुझे मेरा जवाब मिल गया था और मैने कदम बढ़ा दिए थे.वो और उसका घर पीछे छूट गये थे और सूरज क्षतिज मे डूब रहा था.

Wednesday, July 16, 2014

जब उसकी आँख का आख़िरी कतरा भी सूख गया तो वो उठा निकर से धूल झाड़ी, अपने चकनाचूर हुए सपनो के टुकड़े बटोरे और उन्हे बस्ते के हवाले किया जहाँ पहले से रंग-बिरंगे कंचे झिलमिला रहे थे. बचपन के प्यार का बचपन मे ही बिछड़ जाना कितना तकलीफ़ देता है ये बीते २८ दिनो मे उसने जान लिया था. वो रोज यहाँ चला आता था इसी पेड़ के नीचे बैठ जी भर के रोता और फिर बस्ता उठा घर चला जाता. अगले दिन फिर वही क्रम. इतने दिनो मे उसने देखा की उसके बहाए  आँसुओ से ज़मीन भी नम हो गयी है और उसमे हरियाली उग आई है. उस नये उग आए तंतु को देख उसे महसूस हुआ   कि जिंदगी अपनी ज़मीन अपना आसमान ढूँढ ही लेती है. अपने हिस्से की हवा और अपने हिस्से की नमी चाहे वो आँसुओ  से भीगी हुई, नमकीन ही क्यू ना हो. लेकिन जिंदगी कभी फलना फूलना नही छोड़ती. यही छोटा पौधा उसे भी जीने का सबक सीखा गया .बस वो उठा बस्ता कंधे पे टंगा, होंठो को गोल करके सीटी बजाई और पगडंडी से नीचे उतर गया .

उसके बाद किसी ने उसे वहाँ नही देखा. हाँ वो तंतु अब एक बड़ा सा पेड़ बन गया है और उसके पत्ते आज भी नमकीन है.

Wednesday, July 9, 2014

मैं क्यू पढ़ता हूँ या कोई भी क्यू पढ़ता हैं इसके कुछ सीधे से जवाब हो सकते है जैसे, मन बहलाने के लिए, सीखने के लिए या फिर कूल दिखने के लिए. पर मुझे लगता है मैं पढ़ता हूँ यायावर होने के लिए. जी हाँ, ठीक सुना आपने . मेरा मन ठहरा घुमंतू प्रवति का. लेकिन अब ख़ानाबदोश हो जाना सब के किस्मत मे तो होता नही, तो बस कोई किताब उठाते है और विचरण करने लगते है उसके देशकाल, शहर, गलियो मे, नुक्कड़ पे चाय सुड़कते, पोखरो मे पैर लटकाए, जंगलो मे हिरण का पीछा करते और समुद्र के ऊपर उड़ते किसी प्रवासी पक्षी के साथ-साथ. ये यायवरी, ये खानाबदोशी और कहाँ मिलेगी सिवाय इन किताबो की वो भी अपनी सहूलियत से. ये कितबे ही तो है जो ' वोल्गा से गंगा' तक का सफ़र लम्हो मे कराती है, हमे गाँव-जावार ले जाती है तो महानगरॉ मे भी. बेतरतीब बसे कस्बो की सैर कराती है तो 'सोहो का सफ़र' भी यहीं होता है.

पढ़ना मेरे लिए रह्स्य, रोमांच और अनुभव इन तीनो का मिश्रण है, जितना भी कोई पढ़ ले उतना ही उसे अहसास होता जाएगा की वो कितना कम जनता है. कितबे इस दुनिया को देखने, समझने की हमारी समझ को विकसित कर, हमारी विचारधारा को परिष्कृत कर हमे एक बेहतर इंसान बनाती है. और यही से मानव मे जिग्यासा उत्‍पन्न होती है और पढ़ने की, और जानने की.

तो आइए अनुभव ले, पढ़े और औरो को भी प्रेरित करे, बन जाए यायावर एक बार फिर से, अपने खोल से बाहर निकले पंख फैलाए और नाप ले इस धरा का कोना कोना.  






Thursday, July 3, 2014

 क़िताब और मैं

पढ़ने की जो आदत बचपन से थी आज तक कायम है, शुरुआत चाचा चौधरी से हुई और बिल्लू, पिंकी, रमन, श्रीमतीजी से बढ़ती हुई राम-रहीम, बाकेलाल, हवलदार बहादुर, सुपर कॉमांडो ध्रुव, नागराज, डोगा, भोकाल, परमाणु, क्रुक बॉन्ड, अंगारा से होती हुई नंदन, बालहंस, चंपक, लोटपोट पर जाकर थमी. जब कुछ बड़े हुए तो सुरेन्द्र मोहन पाठक और जेम्ज़ हेडली चेस के उपन्यास चाटने लगे. बस तब से ही लत लगी गयी इन किताबो की और इन अफ़सानो की. जो भी जैसा भी उपलब्ध हो पढ़ लेता, कोई भी भाषा हो, कोई भी लेखक हो, कोई भी श्रेणी हो, पढ़ना मतलब पढ़ना. 'जात ना पूछो साधु' की बस ज्ञान ले लो तब जीवन मे इतनी अफरा-तफ़री भी नही हुआ करती थी. जब २१ की उम्र मे पहली नौकरी की तब पता नही था की आगे पढ़ पाऊँगा या नही, हाँलाकि पढ़ना जारी रहा लेकिन केवल पाठ्य पुस्तके ही पढ़ता था.

समय के साथ हम अपनी व्यस्ताओ से ऐसे घिर जाते है की वक़्त हमारे पास ना अपने लिए होता है ना अपनो के लिए. सोचा जब फ़ुर्सत मिलेगी तब वापस पढ़ना चालू करूँगा. पर सोचने से कभी कोई काम बना है किसी का (काम करने से बनता है) दूसरा ये फ़ुर्सत ऐसी शह है जो बाद मरने के भी नसीब हो जाए तो करम जानिए उपरवाले का.

तो अब जनाब निर्णय ले लिया है की पड़ेंगे भी और लिखेंगे भी, लगातार बिना नागा किए. जैसा भी लिखे अछा या बुरा या बदतर पर लिखेंगे. कोई पढ़े तो ठीक न पढ़े तो खुद के लिए ही सही पर रुकेंगे नही क्यूकी जो थम जाए वो जिंदगी नही और ग़लतीया करके सीखना बेहतर है बिना कुछ किए इस दुनिया से चले जाने से. जैसे एक कारीगर पत्थर को खुदा बना देता है वैसे ही कितबे आदमी को निखार कर इंसान बना देती है. अपनी मसरूफ़ियत से घिरा इंसान आज चाहकर भी अपने मन की थाह नही ले पाता की वो असल मे चाहता क्या है ? बस एक दिन रुखसत हो जाता है चुपचाप कुछ करने की आस मन मे लिए. वैसे हर अफ़साने मे सच्चाई होती है और हर सच्चाई मे अफ़साने शुमार होते है. बस यही एक खुबी है किताबो की जो लोगो को जोड़ती है. जब हम कोई कहानी पढ़ते है, उसके किरदार हमे अपने से जान पढ़ते है. कही कही तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी किरदार को हम बरसो से जानते हो या कभी मान बोल उठता है ,"अरे ये तो मेरी कहानी है". प्रेमचंद की ईदगाह के हामिद मे हमे अपना बचपन दिखता है, तो गुनाहो का देवता के चंदर मे लड़कपन, पुश्किन और चेखव के किरदारो मे...........

खैर इस तरह तो बाते ख़त्म ही ना होंगी. हज़ारो लेखक है, लाखो किताबे और अनगिनत किरदार. कब, कौन, कहाँ और कैसे टकरा जाए क्या पता. तो पढ़ते चलिए और लुत्फ़ लेते चलिए इन अनछुए अहसासो की जो शब्दो मे पिरोकर किताब की शक्ल मे आपका इंतेज़ार कर रहे है.

चलिए अब विदा




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Friday, May 2, 2014

Dear Spidy

U disappointed me this time. But enjoy as its not your mistake Mr Webb might taken himself as a real spider and woven a messy web as this flick. Nothing new in it, poor spider man fighting with so many villains and her inner side as well.

During entire show I had been waiting for a surprise element sadly that never occur. First time you made me bore, literally if u don't believe just check the reviews. I miss my old spidy (Tobey Maguire) and his lady love, they might grown old thats y new spidy came into existence. Both Hero and Villain look sick. Only good thing in this movie is Emma Stone however Jammie Foxx as Electro and Max made it a little tolerable.

Though movie is total disappointment.