Wednesday, July 16, 2014

जब उसकी आँख का आख़िरी कतरा भी सूख गया तो वो उठा निकर से धूल झाड़ी, अपने चकनाचूर हुए सपनो के टुकड़े बटोरे और उन्हे बस्ते के हवाले किया जहाँ पहले से रंग-बिरंगे कंचे झिलमिला रहे थे. बचपन के प्यार का बचपन मे ही बिछड़ जाना कितना तकलीफ़ देता है ये बीते २८ दिनो मे उसने जान लिया था. वो रोज यहाँ चला आता था इसी पेड़ के नीचे बैठ जी भर के रोता और फिर बस्ता उठा घर चला जाता. अगले दिन फिर वही क्रम. इतने दिनो मे उसने देखा की उसके बहाए  आँसुओ से ज़मीन भी नम हो गयी है और उसमे हरियाली उग आई है. उस नये उग आए तंतु को देख उसे महसूस हुआ   कि जिंदगी अपनी ज़मीन अपना आसमान ढूँढ ही लेती है. अपने हिस्से की हवा और अपने हिस्से की नमी चाहे वो आँसुओ  से भीगी हुई, नमकीन ही क्यू ना हो. लेकिन जिंदगी कभी फलना फूलना नही छोड़ती. यही छोटा पौधा उसे भी जीने का सबक सीखा गया .बस वो उठा बस्ता कंधे पे टंगा, होंठो को गोल करके सीटी बजाई और पगडंडी से नीचे उतर गया .

उसके बाद किसी ने उसे वहाँ नही देखा. हाँ वो तंतु अब एक बड़ा सा पेड़ बन गया है और उसके पत्ते आज भी नमकीन है.

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