Monday, April 21, 2008

हिन्द-युग्म: सन्नी चंचलानी कहते हैं
हिन्द-युग्म: सन्नी की 'नुसरत' गंदगी क्यों बटोरती है?

हिन्द-युग्म: राष्ट्रपिता (सातवीं कविता)

हिन्द-युग्म: राष्ट्रपिता (सातवीं कविता)

Race

रेस
रेस। एक और बालीवुड मसाला। साजिश, चालबाजी, संस्पैंस, ढेर सारा पैसा, धमाके के साथ उछलती गाड़ियाW और सितारो की भीड़। श्ुारूआती भीड़ खीचने के लिये इतना काफी है। चमकती कारो और दमकती लड़कियो को देखने के बाद अगर फिल्म मे कुछ देखने लायक बचता तो बेचारा दर्शक वो भी देख लेता। साधारत: कहानी मे प्लाWट होता है लेकिन यहाW प्लाWट में कहानी है। फिल्म की कहानी या कहिये प्लाWट दो सौतेले भाइयो के इर्द-गिर्द घूमती है। जो मरने मारने पर उतारू है और पैसे के पीछे पगला गये है। अब वो जमाना गया जब भाई-भाई पर जान छिड़कता था। अब जान लेने की बात होती है। संस्पैंस के भरपूर तड़का लगाया गया है सो फिल्म हर मोड़ पर चौकाती है और अंत तक दर्शक को सीट से चिपकाकर रखती है। आजकल सिनेमा डाWलरमयी हो गया है या कहिये कि डाWलरीकरण करवा दिया गया है और रेस भी उससे अछूती नही है। 100 मिलियन डाWलर और 200 मिलियन डाWलर की बात ऐसे होती है मानो पाWपकार्न खाने की बात हो रही है। फिल्म मे साजिश के तहत एक हत्या होती है। मगर इंश्यारंेंस कंपनी की दानवीरता देखिये सैकड़ो मिलियन डाWलत ‘दान’ देने से पहले जाWच-पड़ताल भी नही करती। भला हो ऐसी कंपनियो का अन्यथा ऐसी मसालेदार फिल्म बना पाना सम्भव नही था। फिल्म वैसी ही है जैसी अब्बास-मस्ताननुमा फिल्मे हुआ करती है। हाWलाकि निर्देशक-युगल की पिछली कुछ फिल्मो से यह बेहतर है। अच्छा होता यदि पटकथा थोड़ी और कसी हुयी होती।
रेस मे कुलमिलाकर छ: पात्र है और उसमे से भी पाWच पात्र अनैतिक व मक्कार है। जो एक पात्र मक्कार होने के महत्वपूर्ण कार्य से बच गया है फिल्म मे उसके हिस्से इक्के-दुक्के फालतू के सीन के अतिरिक्त कुछ आया भी नही है। और वो पात्र है निभाया है समीरा रेड~डी ने। लगता है समीरा के पास ढंग की भूमिकाओ की या काम की कमी है इसकिये वे ऐसी छोटी-मोटी भरती की भूमिकाए स्वीकार कर रही है। अन्य दो नायिकाओ बिपाशा बासू तथा कैटरीना कैफ मे कपड़े कम पहनने और मक्कार होने की ‘रेस’ लगी हुयी है। अब कौन जीता और कौन जीतते-जीतते रह गया यह तो फिल्म देखने पर आप स्वयं जान जायेगें।
अब बात करते है नायको की तो फिल्म मे मौजूद है एकदम झकास अनिल कपूर, छोटे नवाब सैफ अली और मिस्टर कूल अक्षय खन्ना। सैफ जहाW दाढ़ी बढ़ाकर और शर्ट उतारकर अभिनय कर रहे है, कुछ हटके दिखे है। अक्षय अपने चिर-परिचित अंदाज मे उपस्थित है। यहाW प्रशंसा करनी होगी अनिल कपूर की कि वे आज भी नए कलाकरो से कम नही लगते। अनिल कपूर ने एक साउथ अफzीकन पुलिस आWफिसर का किरदार निभाया है जोकि सिरे से भzष्ट है और हम समझते है कि भघ्टाचार महज भारत की समस्या है।
फिल्म के संगीतकार है प्रीतम। लेकिन कहना न होगा कि संगीत कोई खास कमाल नही कर पाया है। बावजूद उसके थ्ड रेडियो वाले दिन रात बजाये पड़े है। आतिफ का गाया एक गाना ही ठीक-ठाक बन पड़ा है। बाकी गीतो का भगवान ही मालिक है। गीत के बोल हिन्दी-अंगzेजी की खिचड़ी है और आर्कषित नही करते है।
फिल्म की शूटिंग दक्षिण अफzीका मे की गयी है और अगर भारत मे करते तो भी कोइ फर्क नही पड़ता। कहा जाता है सिनेमा समाज का आईना होती है और अगर समाज का आईना ऐसा है तो यह कहना गलत न होगा कि दर्पण जरा गंदला हो गया है और उसे साफ किये जाने की जरूरत है।

Jodha Akbar

जोधा अकबर
भव्यतम सेट, आखो को चौधियाते भारी-भरकम गहने, आलीशान पोशाके और युद्ध के बेहतरीन एवं रोमांचकारी दृश्य। वो सभी कंटेट जोधा-अकबर मे है जो कि एक ऐतिहासिक फिल्म में होना चाहिए। सबसे पहले बात करते है स्टार कास्ट की। फिल्म मे दो ही मुख्य कलाकार है जैसा कि टाइटल से ही ज्ञात हो जाता है और वो है रितिक रौशन और ऐश्वर्या राय बच्चन। रितिक मौजूद है मुगल श्ंाहशह अकबर के रोल मे और ऐश्वर्या राय बच्च्न उपस्थिित है राजपूत राजकुमारी जोधा के पात्र मे। जहा रितिक ने मुगल बादशाह अकबर के रोल के साथ पूरी तरह न्याय किया है। वही ऐश्वर्या स्वभाविक रूप से सुन्दर दिखी है। अन्य कलाकारो मे सोनू सूद, कुलभूघण खरबन्दा तथा रजा मुराद आदि है। लेकिन फिल्म मे उनके करने के लिये कुछ खास नही है। परन्तू पृघ्ठभूमि इतिहास होने के कारण सभी पात्र अपना विशेष महत्व रखते है।
फिल्म मे कही-कही हालीवुड फिल्म ‘ग्लेडिएटर’ तथा ‘ट~ाWय’ के प्रभाव दिखते है। फिल्म की सिनेमेट~ोगzाफी उच्चस्तरीय है, खासतौर से युद्ध-दृश्य जिनको फिल्माने के लिये विदेशी तकनीशियनो की मदद ली गयी है। ये दृश्य आपको युद्ध के रोमांWच से भर देते है। इसके अलावा भव्य इमारते, महल, राजा-रजवाड़े, दरबार-ए-आम और कलाकारो के आउटफिटस आपको उठाकर सल्तनत काल मे ले जाते है। भाषा की जादूगरी ऐसी कि आप दाद दिये बिना न रहे पायेगें। एक तरफ रितिक उर्दू-फारसी बोलते है और पूरी तरह मुगल दिखे है। दूसरी तरफ ऐश्वर्या समेत सभी राजपूत किरदार शुद्ध हिन्दी बोलते है। रितिक ने अकबर के रोल के लिये काफी मेहनत की है। उठने, बैठने, खड़े रहने, बात करने सभी सामान्य सी लगने वाली बातो पर भी ध्यान दिया गया है। उन्होने ने अपनी आवाज में बुलंदी और कशिश पैदा करने की पुरजोर कोशिश की है । निर्माता-युगल आशुतोष गोवारीकर तथा राWनी स्कzूवाला को विषय-चयन के लिये बधाई दी जानी चाहिए। ‘लगान’ तथा ‘स्वदेश’ के बाद आशुतोष की यह तीसरी बड़ी निर्देशकीय पारी है लेकिन उनकी पहली दो फिल्मे जहाW उदेश्यपरक थी, वही जोधा-अकबर इस मामले मे चूक गयी है। और सिर्फ एक बादशाह की प्रेम कहानी लगती है।
लगान की सफलता तथा स्वदेश से जो अपेक्षाए की गयी थी उन पर खरा न उतर पाने के कारण ही शायद निर्देशक ने बीच का रास्ता अपनाया है। संभवत: यही कारण है कि इस बार फिल्म की नायिका कोई अन्जान कलाकार न होकर ऐश्वर्या है जो उमz के 34 बसंत देख चुकी है। कहानी के मुताबिक जोधा को एक षोडशी होना चाहिए था। दीपिका पादुकोण या कैटरीना कैफ एक अच्छा विकल्प हो सकती थी।
संगीत की कमान संभाली है ए.आर.रहमान ने। जिन पर निर्देशक ने एक बार फिर भरोसा जताया है और रहमान ने भी अपनी छवि के अनुरूप संगीत दिया है। आजकल के कानफोड़ू संगीत से इतर कुछ रचने मे वे कामयाब रहे है। सभी गीत मधुर है तथा दिलोदिमाग का सुकून पहुचाते है। जावेद अख्तर के बोल तन्हाइयो मे जादू जगाने की ताकत रखते है। सूफी गीत और भजन का एक साथ आनंद आप फिल्म मे ले सकते है।
बहरहाल मुगल शंहशाहो मे केवल अकबर ही ऐसे थे जिन्होने कौमी एकता पर जोर दिया था। आज हमारे देश को साम्प्रदायिक सौहार्द के सिद्धान्त की सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि उस कालखण्ड का शासक ऐसी उन्नत सोच रख सकता है तो क्या हम इक्कीसवी सदी के पढ़े-लिखे लोग तथा हमारे प्रशासक इस बात पर ध्यान नही दे सकते?
जोधा अकबर
भव्यतम सेट, आखो को चौधियाते भारी-भरकम गहने, आलीशान पोशाके और युद्ध के बेहतरीन एवं रोमांचकारी दृश्य। वो सभी कंटेट जोधा-अकबर मे है जो कि एक ऐतिहासिक फिल्म में होना चाहिए। सबसे पहले बात करते है स्टार कास्ट की। फिल्म मे दो ही मुख्य कलाकार है जैसा कि टाइटल से ही ज्ञात हो जाता है और वो है रितिक रौशन और ऐश्वर्या राय बच्चन। रितिक मौजूद है मुगल श्ंाहशह अकबर के रोल मे और ऐश्वर्या राय बच्च्न उपस्थिित है राजपूत राजकुमारी जोधा के पात्र मे। जहा रितिक ने मुगल बादशाह अकबर के रोल के साथ पूरी तरह न्याय किया है। वही ऐश्वर्या स्वभाविक रूप से सुन्दर दिखी है। अन्य कलाकारो मे सोनू सूद, कुलभूघण खरबन्दा तथा रजा मुराद आदि है। लेकिन फिल्म मे उनके करने के लिये कुछ खास नही है। परन्तू पृघ्ठभूमि इतिहास होने के कारण सभी पात्र अपना विशेष महत्व रखते है।
फिल्म मे कही-कही हालीवुड फिल्म ‘ग्लेडिएटर’ तथा ‘ट~ाWय’ के प्रभाव दिखते है। फिल्म की सिनेमेट~ोगzाफी उच्चस्तरीय है, खासतौर से युद्ध-दृश्य जिनको फिल्माने के लिये विदेशी तकनीशियनो की मदद ली गयी है। ये दृश्य आपको युद्ध के रोमांWच से भर देते है। इसके अलावा भव्य इमारते, महल, राजा-रजवाड़े, दरबार-ए-आम और कलाकारो के आउटफिटस आपको उठाकर सल्तनत काल मे ले जाते है। भाषा की जादूगरी ऐसी कि आप दाद दिये बिना न रहे पायेगें। एक तरफ रितिक उर्दू-फारसी बोलते है और पूरी तरह मुगल दिखे है। दूसरी तरफ ऐश्वर्या समेत सभी राजपूत किरदार शुद्ध हिन्दी बोलते है। रितिक ने अकबर के रोल के लिये काफी मेहनत की है। उठने, बैठने, खड़े रहने, बात करने सभी सामान्य सी लगने वाली बातो पर भी ध्यान दिया गया है। उन्होने ने अपनी आवाज में बुलंदी और कशिश पैदा करने की पुरजोर कोशिश की है । निर्माता-युगल आशुतोष गोवारीकर तथा राWनी स्कzूवाला को विषय-चयन के लिये बधाई दी जानी चाहिए। ‘लगान’ तथा ‘स्वदेश’ के बाद आशुतोष की यह तीसरी बड़ी निर्देशकीय पारी है लेकिन उनकी पहली दो फिल्मे जहाW उदेश्यपरक थी, वही जोधा-अकबर इस मामले मे चूक गयी है। और सिर्फ एक बादशाह की प्रेम कहानी लगती है।
लगान की सफलता तथा स्वदेश से जो अपेक्षाए की गयी थी उन पर खरा न उतर पाने के कारण ही शायद निर्देशक ने बीच का रास्ता अपनाया है। संभवत: यही कारण है कि इस बार फिल्म की नायिका कोई अन्जान कलाकार न होकर ऐश्वर्या है जो उमz के 34 बसंत देख चुकी है। कहानी के मुताबिक जोधा को एक षोडशी होना चाहिए था। दीपिका पादुकोण या कैटरीना कैफ एक अच्छा विकल्प हो सकती थी।
संगीत की कमान संभाली है ए.आर.रहमान ने। जिन पर निर्देशक ने एक बार फिर भरोसा जताया है और रहमान ने भी अपनी छवि के अनुरूप संगीत दिया है। आजकल के कानफोड़ू संगीत से इतर कुछ रचने मे वे कामयाब रहे है। सभी गीत मधुर है तथा दिलोदिमाग का सुकून पहुचाते है। जावेद अख्तर के बोल तन्हाइयो मे जादू जगाने की ताकत रखते है। सूफी गीत और भजन का एक साथ आनंद आप फिल्म मे ले सकते है।
बहरहाल मुगल शंहशाहो मे केवल अकबर ही ऐसे थे जिन्होने कौमी एकता पर जोर दिया था। आज हमारे देश को साम्प्रदायिक सौहार्द के सिद्धान्त की सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि उस कालखण्ड का शासक ऐसी उन्नत सोच रख सकता है तो क्या हम इक्कीसवी सदी के पढ़े-लिखे लोग तथा हमारे प्रशासक इस बात पर ध्यान नही दे सकते?

Tuesday, April 8, 2008

Namaste London

A film about relationship. First we talk about story. Jaisa ki aajkal ki jyadatar filmo me hota hai vaisa hi yanha par bhi hai, kahani kuch khas nahi hai ya kahe kahani poori filmy hai. But the treatment of the subject is superb. Janhan tak acting ki bat hai all of them done a pretty nice job. Lekin film ki jo jaan hai wo hai film ke hero Akshay Kumar. He really steels the show playing the role of a Punjabi Munda. This is the kind of job that is done by heart. Akki at his best. Mujhe yaad hai kuch samay pahle me jab ‘Dil To Pagal Hai’ dekh raha tha, people were leaving the hall on his entry, but now time has changed. Film me Akshay ki jabardast entry hai. A bou on Enfield, wearing long kurta with jeans, pierced ear, sunglasses everything just Perfect. A real Punjabi Munda and the dialogues he delivered in pujnbi, “Me adjust kar langa, Bapu.” awesome.Now we come to the heroine of the movie Kaithrina Kaif. She is simply stunning, very beautiful and the outfits she wears in the movie make her more beautiful. Especially the wedding gown she wears and looks like an angel. She is there with the attitude of A British and Charm of An Indian. She plays the role of British girl very easily(as we know she is from London). Kaha jar aha hai Kaith ne dialogue khud hi bole hai who bhi hindi me lekin jyadatar dialogues(Kaith ke) English me hai. The online chemistry between these two (Akki n Kaif) is like ‘made for each other’. Before this movie we have seen them in ‘Humko Deewan Kar Gaye.’ Lekin us film me jo galtiya hui thi unhe yahan duhraya nahi gaya hai. Film kahin bhi dheemi nahi hoti hai. Comedy, drama, emotions, smooth directon everything is there u just enjoy the movie (thanks to Vipul Shah). Title se hi pata chalta hai film me London apne pure attractions k sath moujood hai. Film k anya kalakaro me Rishi Kapoor, Upen Patel adi hai jahan Rishi Kapoor ne ek NRI ki bhumika bade hi jeevant tarike se nibhayi hai, vahi Upen k liye karne ko kuch khas nahi hai. Banda dikhta achha hai, bolta bhi achha hai. Asha hai ane wali filmo me bhi jouhar dikhange. Chaliy ab film k sangeet ki taraf rukh karte hai. Sangeet Himesh Reshamiya ne diya hai aur gane bhi gaye hai.Chakna-chakna and Rafta-rafta are good one u can hear them again n again. After all movie has everything that youth desire to see. Yeh film nishchit hi Aksay aur Kaif k liye achhi hai janha Akshay ka overseas market improve hoga vahi dusri taraf Kaif bhi leading actresses ki race me shamil ho sakti hai. Hope director Vipul Shah will repeat this Hotcake couple again in his movie. Aur chalete-chalte film me ek British actor bhi hai. He is a handsome guy with attractive name Charlie Brown.