रेस
रेस। एक और बालीवुड मसाला। साजिश, चालबाजी, संस्पैंस, ढेर सारा पैसा, धमाके के साथ उछलती गाड़ियाW और सितारो की भीड़। श्ुारूआती भीड़ खीचने के लिये इतना काफी है। चमकती कारो और दमकती लड़कियो को देखने के बाद अगर फिल्म मे कुछ देखने लायक बचता तो बेचारा दर्शक वो भी देख लेता। साधारत: कहानी मे प्लाWट होता है लेकिन यहाW प्लाWट में कहानी है। फिल्म की कहानी या कहिये प्लाWट दो सौतेले भाइयो के इर्द-गिर्द घूमती है। जो मरने मारने पर उतारू है और पैसे के पीछे पगला गये है। अब वो जमाना गया जब भाई-भाई पर जान छिड़कता था। अब जान लेने की बात होती है। संस्पैंस के भरपूर तड़का लगाया गया है सो फिल्म हर मोड़ पर चौकाती है और अंत तक दर्शक को सीट से चिपकाकर रखती है। आजकल सिनेमा डाWलरमयी हो गया है या कहिये कि डाWलरीकरण करवा दिया गया है और रेस भी उससे अछूती नही है। 100 मिलियन डाWलर और 200 मिलियन डाWलर की बात ऐसे होती है मानो पाWपकार्न खाने की बात हो रही है। फिल्म मे साजिश के तहत एक हत्या होती है। मगर इंश्यारंेंस कंपनी की दानवीरता देखिये सैकड़ो मिलियन डाWलत ‘दान’ देने से पहले जाWच-पड़ताल भी नही करती। भला हो ऐसी कंपनियो का अन्यथा ऐसी मसालेदार फिल्म बना पाना सम्भव नही था। फिल्म वैसी ही है जैसी अब्बास-मस्ताननुमा फिल्मे हुआ करती है। हाWलाकि निर्देशक-युगल की पिछली कुछ फिल्मो से यह बेहतर है। अच्छा होता यदि पटकथा थोड़ी और कसी हुयी होती।
रेस मे कुलमिलाकर छ: पात्र है और उसमे से भी पाWच पात्र अनैतिक व मक्कार है। जो एक पात्र मक्कार होने के महत्वपूर्ण कार्य से बच गया है फिल्म मे उसके हिस्से इक्के-दुक्के फालतू के सीन के अतिरिक्त कुछ आया भी नही है। और वो पात्र है निभाया है समीरा रेड~डी ने। लगता है समीरा के पास ढंग की भूमिकाओ की या काम की कमी है इसकिये वे ऐसी छोटी-मोटी भरती की भूमिकाए स्वीकार कर रही है। अन्य दो नायिकाओ बिपाशा बासू तथा कैटरीना कैफ मे कपड़े कम पहनने और मक्कार होने की ‘रेस’ लगी हुयी है। अब कौन जीता और कौन जीतते-जीतते रह गया यह तो फिल्म देखने पर आप स्वयं जान जायेगें।
अब बात करते है नायको की तो फिल्म मे मौजूद है एकदम झकास अनिल कपूर, छोटे नवाब सैफ अली और मिस्टर कूल अक्षय खन्ना। सैफ जहाW दाढ़ी बढ़ाकर और शर्ट उतारकर अभिनय कर रहे है, कुछ हटके दिखे है। अक्षय अपने चिर-परिचित अंदाज मे उपस्थित है। यहाW प्रशंसा करनी होगी अनिल कपूर की कि वे आज भी नए कलाकरो से कम नही लगते। अनिल कपूर ने एक साउथ अफzीकन पुलिस आWफिसर का किरदार निभाया है जोकि सिरे से भzष्ट है और हम समझते है कि भघ्टाचार महज भारत की समस्या है।
फिल्म के संगीतकार है प्रीतम। लेकिन कहना न होगा कि संगीत कोई खास कमाल नही कर पाया है। बावजूद उसके थ्ड रेडियो वाले दिन रात बजाये पड़े है। आतिफ का गाया एक गाना ही ठीक-ठाक बन पड़ा है। बाकी गीतो का भगवान ही मालिक है। गीत के बोल हिन्दी-अंगzेजी की खिचड़ी है और आर्कषित नही करते है।
फिल्म की शूटिंग दक्षिण अफzीका मे की गयी है और अगर भारत मे करते तो भी कोइ फर्क नही पड़ता। कहा जाता है सिनेमा समाज का आईना होती है और अगर समाज का आईना ऐसा है तो यह कहना गलत न होगा कि दर्पण जरा गंदला हो गया है और उसे साफ किये जाने की जरूरत है।
Monday, April 21, 2008
Race
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