जोधा अकबर
भव्यतम सेट, आखो को चौधियाते भारी-भरकम गहने, आलीशान पोशाके और युद्ध के बेहतरीन एवं रोमांचकारी दृश्य। वो सभी कंटेट जोधा-अकबर मे है जो कि एक ऐतिहासिक फिल्म में होना चाहिए। सबसे पहले बात करते है स्टार कास्ट की। फिल्म मे दो ही मुख्य कलाकार है जैसा कि टाइटल से ही ज्ञात हो जाता है और वो है रितिक रौशन और ऐश्वर्या राय बच्चन। रितिक मौजूद है मुगल श्ंाहशह अकबर के रोल मे और ऐश्वर्या राय बच्च्न उपस्थिित है राजपूत राजकुमारी जोधा के पात्र मे। जहा रितिक ने मुगल बादशाह अकबर के रोल के साथ पूरी तरह न्याय किया है। वही ऐश्वर्या स्वभाविक रूप से सुन्दर दिखी है। अन्य कलाकारो मे सोनू सूद, कुलभूघण खरबन्दा तथा रजा मुराद आदि है। लेकिन फिल्म मे उनके करने के लिये कुछ खास नही है। परन्तू पृघ्ठभूमि इतिहास होने के कारण सभी पात्र अपना विशेष महत्व रखते है।
फिल्म मे कही-कही हालीवुड फिल्म ‘ग्लेडिएटर’ तथा ‘ट~ाWय’ के प्रभाव दिखते है। फिल्म की सिनेमेट~ोगzाफी उच्चस्तरीय है, खासतौर से युद्ध-दृश्य जिनको फिल्माने के लिये विदेशी तकनीशियनो की मदद ली गयी है। ये दृश्य आपको युद्ध के रोमांWच से भर देते है। इसके अलावा भव्य इमारते, महल, राजा-रजवाड़े, दरबार-ए-आम और कलाकारो के आउटफिटस आपको उठाकर सल्तनत काल मे ले जाते है। भाषा की जादूगरी ऐसी कि आप दाद दिये बिना न रहे पायेगें। एक तरफ रितिक उर्दू-फारसी बोलते है और पूरी तरह मुगल दिखे है। दूसरी तरफ ऐश्वर्या समेत सभी राजपूत किरदार शुद्ध हिन्दी बोलते है। रितिक ने अकबर के रोल के लिये काफी मेहनत की है। उठने, बैठने, खड़े रहने, बात करने सभी सामान्य सी लगने वाली बातो पर भी ध्यान दिया गया है। उन्होने ने अपनी आवाज में बुलंदी और कशिश पैदा करने की पुरजोर कोशिश की है । निर्माता-युगल आशुतोष गोवारीकर तथा राWनी स्कzूवाला को विषय-चयन के लिये बधाई दी जानी चाहिए। ‘लगान’ तथा ‘स्वदेश’ के बाद आशुतोष की यह तीसरी बड़ी निर्देशकीय पारी है लेकिन उनकी पहली दो फिल्मे जहाW उदेश्यपरक थी, वही जोधा-अकबर इस मामले मे चूक गयी है। और सिर्फ एक बादशाह की प्रेम कहानी लगती है।
लगान की सफलता तथा स्वदेश से जो अपेक्षाए की गयी थी उन पर खरा न उतर पाने के कारण ही शायद निर्देशक ने बीच का रास्ता अपनाया है। संभवत: यही कारण है कि इस बार फिल्म की नायिका कोई अन्जान कलाकार न होकर ऐश्वर्या है जो उमz के 34 बसंत देख चुकी है। कहानी के मुताबिक जोधा को एक षोडशी होना चाहिए था। दीपिका पादुकोण या कैटरीना कैफ एक अच्छा विकल्प हो सकती थी।
संगीत की कमान संभाली है ए.आर.रहमान ने। जिन पर निर्देशक ने एक बार फिर भरोसा जताया है और रहमान ने भी अपनी छवि के अनुरूप संगीत दिया है। आजकल के कानफोड़ू संगीत से इतर कुछ रचने मे वे कामयाब रहे है। सभी गीत मधुर है तथा दिलोदिमाग का सुकून पहुचाते है। जावेद अख्तर के बोल तन्हाइयो मे जादू जगाने की ताकत रखते है। सूफी गीत और भजन का एक साथ आनंद आप फिल्म मे ले सकते है।
बहरहाल मुगल शंहशाहो मे केवल अकबर ही ऐसे थे जिन्होने कौमी एकता पर जोर दिया था। आज हमारे देश को साम्प्रदायिक सौहार्द के सिद्धान्त की सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि उस कालखण्ड का शासक ऐसी उन्नत सोच रख सकता है तो क्या हम इक्कीसवी सदी के पढ़े-लिखे लोग तथा हमारे प्रशासक इस बात पर ध्यान नही दे सकते?
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