मैं क्यू पढ़ता हूँ या कोई भी क्यू पढ़ता हैं इसके कुछ सीधे से जवाब हो सकते है जैसे, मन बहलाने के लिए, सीखने के लिए या फिर कूल दिखने के लिए. पर मुझे लगता है मैं पढ़ता हूँ यायावर होने के लिए. जी हाँ, ठीक सुना आपने . मेरा मन ठहरा घुमंतू प्रवति का. लेकिन अब ख़ानाबदोश हो जाना सब के किस्मत मे तो होता नही, तो बस कोई किताब उठाते है और विचरण करने लगते है उसके देशकाल, शहर, गलियो मे, नुक्कड़ पे चाय सुड़कते, पोखरो मे पैर लटकाए, जंगलो मे हिरण का पीछा करते और समुद्र के ऊपर उड़ते किसी प्रवासी पक्षी के साथ-साथ. ये यायवरी, ये खानाबदोशी और कहाँ मिलेगी सिवाय इन किताबो की वो भी अपनी सहूलियत से. ये कितबे ही तो है जो ' वोल्गा से गंगा' तक का सफ़र लम्हो मे कराती है, हमे गाँव-जावार ले जाती है तो महानगरॉ मे भी. बेतरतीब बसे कस्बो की सैर कराती है तो 'सोहो का सफ़र' भी यहीं होता है.
पढ़ना मेरे लिए रह्स्य, रोमांच और अनुभव इन तीनो का मिश्रण है, जितना भी कोई पढ़ ले उतना ही उसे अहसास होता जाएगा की वो कितना कम जनता है. कितबे इस दुनिया को देखने, समझने की हमारी समझ को विकसित कर, हमारी विचारधारा को परिष्कृत कर हमे एक बेहतर इंसान बनाती है. और यही से मानव मे जिग्यासा उत्पन्न होती है और पढ़ने की, और जानने की.
तो आइए अनुभव ले, पढ़े और औरो को भी प्रेरित करे, बन जाए यायावर एक बार फिर से, अपने खोल से बाहर निकले पंख फैलाए और नाप ले इस धरा का कोना कोना.
पढ़ना मेरे लिए रह्स्य, रोमांच और अनुभव इन तीनो का मिश्रण है, जितना भी कोई पढ़ ले उतना ही उसे अहसास होता जाएगा की वो कितना कम जनता है. कितबे इस दुनिया को देखने, समझने की हमारी समझ को विकसित कर, हमारी विचारधारा को परिष्कृत कर हमे एक बेहतर इंसान बनाती है. और यही से मानव मे जिग्यासा उत्पन्न होती है और पढ़ने की, और जानने की.
तो आइए अनुभव ले, पढ़े और औरो को भी प्रेरित करे, बन जाए यायावर एक बार फिर से, अपने खोल से बाहर निकले पंख फैलाए और नाप ले इस धरा का कोना कोना.
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