Monday, July 28, 2014

शीर्षक गुम - ३

बल्ब की मरियल पीली रोशनी कमरे मे फैली हुई थी, कीड़े इस रोशनी के गिर्द उड़ और रेंग रहे थे इस बात से बेख़बर की मौत भी चुपचाप उनकी तरफ़ बढ़ रही है. दीवार पे चिपकी छिपकली कभी सरपट रेंगती और कभी इंतज़ार कर सही मौका झपट किडो को नीवाला बनाती जा रही थी. मैं कमरे मे लेटा ये सब रोज की तरह देख रा था. कीड़े रोशनी की तरफ जाने की ज़िद किए बैठे थे और मौत वही अपने पंजे फैलाए  जमी थी. मुझे कींडो पे तरस आ रा था और उनकी नादानी पे गुस्सा भी. क्यू नही वे इस रोशनी से दूर चले जाते बाकी तीन दीवारो पे बेशक अंधेरा था पर वहाँ मौत तो ना थी आख़िर क्या ज़रूरत हैं उन्हे इस सिम्त आने की.

जवाब मुझे मेरे अक्स ने दिया, क़ि मैं क्यू आया था शहर, क्या मिला मुझे यहाँ आकर, ये छोटा सा धूल और सीलन भरा कमरा जो कहने को एक अदद घर है लेकिन घर जैसी गर्माहट, हिफ़ाज़त और मिट्टी की खुश्बू यहाँ कभी नसीब नही हुई. मैने भी तो रोशनी की तलाश मे आया था शहर, गाँव के दिए को बुझाकर, बड़े से प्रकाश पुंज को पा लेने की हसरत लिए. क्यू नही रहा गाँव मे अपने लोगो की बीच, घर, खेत-खलिहान, तालाब, मंदिर सब कुछ तो था वहाँ फिर क्यूँ खिच लाई शहर की चाकांचौध मुझे.

मैं पसीने से तरबतर हो गया मेरा अक्स कहीं खो गया था मैने खुद को कीड़ा बन दीवार पे रेंगेते हुए देखा, मुझे एहसास हो चला था की उन किडो की और मेरी जिंदगी मे कोई फ़र्क ना था.

सचाई मुझे बर्दाश्त नही हुई मैं उठा और खटका दबा के कमरे को अंधेरे से भर दिया. 








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