Monday, August 18, 2014

शीर्षक गुम - 4

हम तेज रफ़्तार से हाइवे पर भागे जा रहे थे, म्यूज़िक लाउड था और हम सब के हाथो मे ड्रिंक्स थे. शायद saturday का होना उतना ही important था जितना की पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना. बस आगे से एक u turn और और उसके बाद जाम ख़त्म कर ढाबे पर लजीज़ खाना. देर रात घर पहुचना, बेसुध हो पलंग पे पसर जाना और ख़ुमारी लाने वाले sunday का इंतजार करना. हर वीकेंड की तरह इस इस वीकेंड का भी काम तमाम.

नया रायपुर के flyover के नीचे से गुजरने के तुरंत बाद एक अंडे वाला सड़क किनारे खड़ा रहता है. शहर से लाए snacks के अलावा boiled eggs की बात ही कुछ और है. मैने हॉर्न दिया, वो दौड़ता हुआ आया और हमारा ऑर्डर ले गया. हम बेसब्री से इंतेज़ार करने लगे इस बार उसे ऑर्डर सर्व करने मे समय ज़्यादा लग रहा था. तभी मेरी नज़र ठेले से फलाँग भर दूर गिट्टी के ढेर पर गयी. उस ढेर पे एक बची गमछा बिछा गहरी नींद मे सोई हुई थी. मुझे अब देरी का कारण समझ आ गया था. वैसे हर बार वो छोटी बच्ची अपने पिता की सहायता करती नज़र आती.. उस बच्ची को देख मुझे खुद पे तरस आया की एक तरफ मैं नर्म बिस्तर पे करवट बदलता रहता हू पर नींद आँखों से कोसो दूर रहती है. दूसरी तरफ मेहनतकश लोग और उनके फूल से बच्चे काँटों के बिस्तर पे भी चैन से सोते है. मैं अपने ख़यालो मे मसरूफ़ था की गाड़ी पे हुए knock  ने मुझे बताया की ऑर्डर आ चुका था हम आरंग की और बढ़ गये. पूरे 15 दिन हो गये लेकिन उस बच्ची की तस्वीर मेरी आँखों से ओझल ना हुई. पता नही बेचारा और ग़रीब अंडे वाला और उसकी बेटी है या हम. हम दूसरो की मेहनत पर अपनी चर्बी बढ़ाने वाले लोग.

उस दिन से मैं सोच रहा हूँ की जीवन क्या है एक पहेली जिसे सुलझा पाना आम इंसान के बूते की बात नही. इसे समझने की लिए महल छोड़ने पड़ते है, सोने के मुकुट का त्याग करना होता है, गौतम से बुद्ध बनना पड़ता है. तब बोध ज्ञान की प्राप्ति होती है. जिंदगी को जीने के लिए क्या चाहिए एक मोह्हबब्त भरा दिल, एक प्यार करने वाला शक्स और फूलो, तितलियो से इश्क करने की सलाहियत. जीना इसी का नाम है. 






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