Thursday, July 3, 2014

 क़िताब और मैं

पढ़ने की जो आदत बचपन से थी आज तक कायम है, शुरुआत चाचा चौधरी से हुई और बिल्लू, पिंकी, रमन, श्रीमतीजी से बढ़ती हुई राम-रहीम, बाकेलाल, हवलदार बहादुर, सुपर कॉमांडो ध्रुव, नागराज, डोगा, भोकाल, परमाणु, क्रुक बॉन्ड, अंगारा से होती हुई नंदन, बालहंस, चंपक, लोटपोट पर जाकर थमी. जब कुछ बड़े हुए तो सुरेन्द्र मोहन पाठक और जेम्ज़ हेडली चेस के उपन्यास चाटने लगे. बस तब से ही लत लगी गयी इन किताबो की और इन अफ़सानो की. जो भी जैसा भी उपलब्ध हो पढ़ लेता, कोई भी भाषा हो, कोई भी लेखक हो, कोई भी श्रेणी हो, पढ़ना मतलब पढ़ना. 'जात ना पूछो साधु' की बस ज्ञान ले लो तब जीवन मे इतनी अफरा-तफ़री भी नही हुआ करती थी. जब २१ की उम्र मे पहली नौकरी की तब पता नही था की आगे पढ़ पाऊँगा या नही, हाँलाकि पढ़ना जारी रहा लेकिन केवल पाठ्य पुस्तके ही पढ़ता था.

समय के साथ हम अपनी व्यस्ताओ से ऐसे घिर जाते है की वक़्त हमारे पास ना अपने लिए होता है ना अपनो के लिए. सोचा जब फ़ुर्सत मिलेगी तब वापस पढ़ना चालू करूँगा. पर सोचने से कभी कोई काम बना है किसी का (काम करने से बनता है) दूसरा ये फ़ुर्सत ऐसी शह है जो बाद मरने के भी नसीब हो जाए तो करम जानिए उपरवाले का.

तो अब जनाब निर्णय ले लिया है की पड़ेंगे भी और लिखेंगे भी, लगातार बिना नागा किए. जैसा भी लिखे अछा या बुरा या बदतर पर लिखेंगे. कोई पढ़े तो ठीक न पढ़े तो खुद के लिए ही सही पर रुकेंगे नही क्यूकी जो थम जाए वो जिंदगी नही और ग़लतीया करके सीखना बेहतर है बिना कुछ किए इस दुनिया से चले जाने से. जैसे एक कारीगर पत्थर को खुदा बना देता है वैसे ही कितबे आदमी को निखार कर इंसान बना देती है. अपनी मसरूफ़ियत से घिरा इंसान आज चाहकर भी अपने मन की थाह नही ले पाता की वो असल मे चाहता क्या है ? बस एक दिन रुखसत हो जाता है चुपचाप कुछ करने की आस मन मे लिए. वैसे हर अफ़साने मे सच्चाई होती है और हर सच्चाई मे अफ़साने शुमार होते है. बस यही एक खुबी है किताबो की जो लोगो को जोड़ती है. जब हम कोई कहानी पढ़ते है, उसके किरदार हमे अपने से जान पढ़ते है. कही कही तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी किरदार को हम बरसो से जानते हो या कभी मान बोल उठता है ,"अरे ये तो मेरी कहानी है". प्रेमचंद की ईदगाह के हामिद मे हमे अपना बचपन दिखता है, तो गुनाहो का देवता के चंदर मे लड़कपन, पुश्किन और चेखव के किरदारो मे...........

खैर इस तरह तो बाते ख़त्म ही ना होंगी. हज़ारो लेखक है, लाखो किताबे और अनगिनत किरदार. कब, कौन, कहाँ और कैसे टकरा जाए क्या पता. तो पढ़ते चलिए और लुत्फ़ लेते चलिए इन अनछुए अहसासो की जो शब्दो मे पिरोकर किताब की शक्ल मे आपका इंतेज़ार कर रहे है.

चलिए अब विदा




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